नैमिषारण्य में श्रीमद्भागवत कथा के यजमान बने गुड्डन नेमा, माता-पिता की स्मृति में लिया धर्मलाभ

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तेंदूखेड़ा। सावन के पवित्र माह में नगर सहित आसपास के क्षेत्रों में लोग विभिन्न धार्मिक आयोजनों और सेवा कार्यों के माध्यम से पुण्य लाभ अर्जित कर रहे हैं। इसी क्रम में तेंदूखेड़ा के नेमा स्वीट संचालक गुड्डन नेमा ने अपनी पत्नी के साथ अपने माता-पिता की स्मृति में उत्तर प्रदेश के पवित्र तीर्थ नैमिषारण्य (नीमसार) में श्रीमद्भागवत कथा के यजमान बनकर धर्मलाभ अर्जित किया।

नैमिषारण्य में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का कलश यात्रा कार्यक्रम 1 अगस्त को हुआ। कथा में मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों से पहुंचे करीब 30 यजमानों ने सहभागिता की। कथा व्यास आचार्य श्री दिवाकर जी रहे। कथा श्रवण के साथ प्रतिदिन रुद्री निर्माण एवं रुद्राभिषेक का आयोजन भी किया गया।

8 अगस्त को कथा का पूर्ण विराम एवं भंडारा-प्रसाद वितरण कार्यक्रम आयोजित हुआ। आयोजन में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर धर्मलाभ लिया। यह संपूर्ण धार्मिक आयोजन सभी श्रद्धालुओं और सहयोगियों के सामूहिक सहयोग से संपन्न हुआ।

पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है नैमिषारण्य

धर्माचार्यों के अनुसार नैमिषारण्य सनातन धर्म के प्रमुख और प्राचीन तीर्थस्थलों में शामिल है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित इस तीर्थ को ‘महातीर्थ’ और ‘तीर्थों का तीर्थ’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां शौनकादि 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी। मान्यता है कि ब्रह्मा जी द्वारा छोड़ा गया मनोमय चक्र जिस स्थान पर गिरा और उसकी नेमि (धुरी) विलीन हुई, उसी के नाम पर इस स्थान का नाम नैमिषारण्य पड़ा।

नैमिषारण्य का उल्लेख पुराणों, महाभारत और रामायण से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में मिलता है। महर्षि दधीचि के अस्थि दान और भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ से भी इस तीर्थ की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

भागवत कथा के समापन के बाद गुड्डन नेमा ने चित्रकूट एवं अयोध्या के तीर्थ दर्शन भी किए। माता-पिता की स्मृति में भागवत कथा के यजमान बनकर उन्होंने धार्मिक आस्था और सेवा की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पुण्य लाभ अर्जित किया।

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