माँ नर्मदा का पावन जल लेकर जागेश्वर धाम के लिए निकले कांवड़ यात्री

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सावन में शिव भक्ति का अनूठा संगम, करीब 100 श्रद्धालु कांवड़ में जल लेकर कर रहे पदयात्रा

तेन्दूखेड़ा। सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव की आराधना और जलाभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। इसी आस्था और भक्ति के साथ श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल लेकर कांवड़ यात्रा करते हुए शिवालयों तक पहुंच रहे हैं। इसी क्रम में करीब 100 कांवड़ यात्रियों का जत्था माँ नर्मदा के पवित्र घाटों से जल भरकर तेंदूखेड़ा होते हुए प्रसिद्ध जागेश्वर धाम, बांदकपुर के लिए रवाना हुआ है।

कांवड़ यात्रियों ने बताया कि उन्होंने सर्रुया घाट, भेड़ाघाट और गौरीघाट सहित माँ नर्मदा के पावन घाटों से जल भरकर अपनी-अपनी कांवड़ में धारण किया और यात्रा शुरू की। अलग-अलग गांवों और स्थानों से आए श्रद्धालु एकत्रित होकर सामूहिक रूप से यह यात्रा कर रहे हैं। तेंदूखेड़ा पहुंचने पर यात्रियों ने खेर माई मंदिर में रात्रि विश्राम किया और सुबह पुनः अपनी यात्रा प्रारंभ की।

यात्रियों के अनुसार शाम तक वे बिजोरा पहुंचकर रात्रि विश्राम करेंगे। इसके बाद अगले दिन यात्रा जारी रखते हुए रविवार शाम तक जागेश्वर धाम बांदकपुर पहुंचने का लक्ष्य है। सोमवार सुबह भगवान शिव का माँ नर्मदा के पवित्र जल से अभिषेक करने के बाद उनकी कांवड़ यात्रा पूर्ण होगी।

कांवड़ यात्रियों में विजय, पथरिया निवासी, प्रीतम सिंह माला खुर्द निवासी, कान्हा सिंह और सचिन रेनी निवासी सहित अनेक श्रद्धालु शामिल हैं। यात्रियों ने बताया कि कई श्रद्धालु पिछले तीन-चार वर्षों से लगातार कांवड़ यात्रा कर रहे हैं।

छात्र भी निभा रहे आस्था की परंपरा

इस कांवड़ यात्रा में ग्राम रेनी के कक्षा सातवीं के छात्र कान्हा और कक्षा आठवीं के छात्र सचिन भी शामिल हैं। दोनों ने बताया कि वे पिछले तीन वर्षों से लगातार कांवड़ यात्रा कर रहे हैं और भविष्य में भी इस परंपरा को जारी रखना चाहते हैं।

सावन में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व

सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान शिवलिंग पर पवित्र जल चढ़ाने से श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करते हैं। कांवड़ यात्रा इसी भक्ति और संकल्प का प्रतीक है, जिसमें श्रद्धालु पवित्र नदी से जल लेकर पैदल शिवधाम पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। कठिन यात्रा के बावजूद श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ कांवड़ लेकर चलते हैं। उनके लिए यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, सेवा और संकल्प की यात्रा भी है।

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