बीजामृत से बीजोपचार किसानों के लिए वरदान, कम लागत में बेहतर उत्पादन का रास्ता

0
Spread the love

बटियागढ़ (दमोह)। कृषि में लगातार बढ़ती लागत और रासायनिक बीजोपचार के विकल्प की तलाश के बीच प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण घटक बीजामृत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जा रहा है। कृषि महाविद्यालय पन्ना के कीटशास्त्र विभाग के डॉ. द्वारका ने बताया कि बीजामृत एक सूक्ष्मजीव युक्त प्राकृतिक घोल है, जो बीजों को रोगों से बचाने, अंकुरण क्षमता बढ़ाने तथा पौधों की प्रारंभिक वृद्धि को मजबूत करने में सहायक है।

उन्होंने बताया कि बीजामृत में मौजूद लाभकारी जीवाणु बीजों की सतह पर सक्रिय होकर फफूंद एवं अन्य रोगजनकों के प्रभाव को कम करते हैं तथा जड़ों के विकास को प्रोत्साहित करते हैं। किसान रूपेन्द्र सिंह ने भी किसानों से इस प्राकृतिक तकनीक को अपनाने की अपील की है।

ऐसे तैयार होता है बीजामृत

डॉ. द्वारका के अनुसार 100 किलोग्राम बीज के उपचार के लिए 5 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर, 5 लीटर गौमूत्र, 50 ग्राम चूना, लगभग 1 किलोग्राम मेड़ या बरगद के पेड़ के नीचे की जीवांशयुक्त मिट्टी तथा 20 लीटर स्वच्छ पानी की आवश्यकता होती है।

बीजामृत बनाने के लिए गोबर को सूती कपड़े में बांधकर 20 लीटर पानी में 12 घंटे तक लटकाया जाता है। वहीं 50 ग्राम चूने को 1 लीटर पानी में घोलकर रातभर रखा जाता है। अगले दिन गोबर की पोटली को अच्छी तरह निचोड़कर उसका अर्क निकालने के बाद उसमें जीवांशयुक्त मिट्टी, गौमूत्र तथा चूने का घोल मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है।

बीजोपचार से मिलते हैं बेहतर परिणाम

विशेषज्ञों के अनुसार बीजों को इस घोल में अच्छी तरह लपेटकर छाया में सुखाने के बाद बुवाई करनी चाहिए। दलहनी फसलों के बीजों को कुछ मिनट तक डुबोना पर्याप्त होता है, जबकि धान, सब्जियों एवं अन्य रोपाई वाली फसलों की जड़ों को रोपाई से पहले 15 से 30 मिनट तक बीजामृत में डुबोने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।

किसान रूपेन्द्र सिंह ने किसानों से सामग्री की उचित मात्रा और समय का विशेष ध्यान रखने की अपील की है।

अंकुरण बढ़ाने और रोगों से बचाव में सहायक

कई अध्ययनों में पाया गया है कि बीजामृत में पौध-विकास को प्रोत्साहित करने वाले जीवाणु और जैव सक्रिय तत्व मौजूद होते हैं, जो अंकुरण क्षमता बढ़ाने, जड़ों के विकास को तेज करने तथा बीज एवं मृदा जनित रोगों से सुरक्षा प्रदान करने में सहायक हैं। इससे फसल की शुरुआती बढ़वार मजबूत होती है और कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

डॉ. द्वारका का कहना है कि “स्वस्थ बीज ही अच्छी फसल की नींव है।” उन्होंने किसानों से बुवाई से पहले इस सरल, सस्ती और प्राकृतिक तकनीक को अपनाने की सलाह दी, जिससे न केवल खेती की लागत कम होगी बल्कि मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

About The Author

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *