महुआ की फसल की बहार: जंगलों में जागकर रखवाली, ग्रामीणों को मिल रही अतिरिक्त आय

दमोह जिले के तेंदूखेड़ा ब्लॉक सहित आसपास के आदिवासी एवं वन क्षेत्रों में इन दिनों महुआ की फसल अपने चरम पर है। जंगलों और गांवों में महुआ के पेड़ों से जमकर फूल झर रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।
महुआ की इस मौसमी फसल की सुरक्षा के लिए लोग रात से ही अपने-अपने पेड़ों के नीचे डेरा डालकर रखवाली करते हैं। कारण यह है कि मवेशी, जंगली सूअर और अन्य वन्य जीव महुआ के फूलों को खा जाते हैं, जिससे भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए ग्रामीण पूरी सतर्कता के साथ फसल की निगरानी करते हैं।
सुबह होते ही लोग महुआ के फूलों को बीनकर घर ले जाते हैं, जहां उन्हें सुखाया जाता है। इसके बाद बाजारों में अच्छे दामों पर बिक्री कर ग्रामीण एक से डेढ़ महीने में अच्छी खासी आमदनी अर्जित कर लेते हैं। खासकर आदिवासी परिवारों के लिए यह आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनता है।
तेंदूखेड़ा ब्लॉक के सेलवाड़ा, साईपुरा, धरी, धुलेरा, हिनोती, रिचकुड़ी, बगदरी, सहजपुर, इमली डोल और हाथी डोल जैसे गांवों में महुआ के पेड़ बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। यहां के लोग खेती के साथ-साथ महुआ बीनकर अतिरिक्त आय का साधन बनाते हैं।
हालांकि इन जंगलों में जंगली जानवरों की मौजूदगी भी बनी रहती है, जिससे खतरा बना रहता है। इसे देखते हुए वन विभाग समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सतर्क रहने की सलाह देता है।
महुआ के अलावा, इन क्षेत्रों के आदिवासी परिवार तेंदूपत्ता संग्रहण से भी अच्छी आय प्राप्त करते हैं। महुआ की फसल मुख्य रूप से मार्च और अप्रैल महीने में होती है और गर्मी के मौसम में इसकी पैदावार बेहतर मानी जाती है।
महुआ की यह बहार न सिर्फ जंगलों की रौनक बढ़ा रही है, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती दे रही है।

