भालुओं की प्यास से पड़ा ‘रीछकुड़ी’ नाम: 200 साल पुरानी परंपरा, आज भी जीवित हैं कुंड

तेंदूखेड़ा — बदलते समय के साथ भले ही प्रकृति का स्वरूप बदला हो, लेकिन इतिहास की कई कहानियां आज भी ग्रामीण अंचलों में जीवित हैं। ऐसा ही एक अनोखा उदाहरण दमोह जिले की जनपद पंचायत तेंदूखेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत महगवां कला के आश्रित गांव रीछकुड़ी में देखने को मिलता है, जहां गांव के नाम के पीछे एक दिलचस्प और ऐतिहासिक वजह जुड़ी है।
तीन कुंड ही हैं जीवन का आधार
रीछकुड़ी गांव में पीने के पानी का कोई बड़ा स्रोत नहीं है। यहां वर्षों से बने तीन प्राकृतिक कुंड ही पूरे गांव की प्यास बुझा रहे हैं। ये कुंड जमीन से लगभग 100 फीट नीचे स्थित हैं, जिनकी गहराई करीब डेढ़ फीट और चौड़ाई 2–3 फीट है। खास बात यह है कि इन कुंडों से पानी निरंतर स्वतः निकलता रहता है और भीषण गर्मी में भी सूखता नहीं।
श्रद्धा और परंपरा का केंद्र
इन कुंडों के प्रति ग्रामीणों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। आसपास कई छोटे-बड़े देवी-देवताओं के मंदिर बने हुए हैं, जहां नियमित पूजा-पाठ होता है। ग्रामीण जब पानी भरने नीचे उतरते हैं तो अपने जूते-चप्पल ऊपर ही उतार देते हैं। उनका मानना है कि यह जल सिद्ध देवताओं की कृपा से प्राप्त होता है, इसलिए इसकी पूजा की जाती है।
पंचायत ने कराया जीर्णोद्धार
ग्राम पंचायत द्वारा इन कुंडों का जीर्णोद्धार कराया गया है। कुंडों तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है और उन्हें सीमेंट व ईंटों से सुदृढ़ कर व्यवस्थित रूप दिया गया है। साथ ही पीने, नहाने और मवेशियों के पानी के लिए अलग-अलग स्थान भी निर्धारित किए गए हैं।
भालुओं से जुड़ी है नाम की कहानी
ग्रामीणों के अनुसार, यह स्थान करीब 200 साल पुराना है। पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था, जहां कई वन्य जीव विचरण करते थे। उस समय यहां रीछ (भालू) बड़ी संख्या में रहते थे। ये भालू अपने झुंड के साथ इन कुंडों पर पानी पीने आते थे और आसपास ही विश्राम करते थे। इसी कारण इस गांव का नाम रीछकुड़ी पड़ गया।
आज भी गांव के आसपास के जंगलों और पहाड़ियों में भालुओं की गुफाएं मौजूद हैं, और कई बार ग्रामीणों को ये जंगली जानवर दिखाई भी देते हैं।
इतिहास, प्रकृति और आस्था का संगम
रीछकुड़ी गांव न केवल एक ऐतिहासिक कहानी को संजोए हुए है, बल्कि यह प्राकृतिक जल स्रोत, आस्था और वन्य जीवन के अद्भुत संगम का भी प्रतीक है। यहां के कुंड आज भी ग्रामीणों के जीवन का आधार बने हुए हैं और अतीत की यादों को जीवंत रखते हैं।

