जुलाई माह में चीतों का होगा नौरादेही में आगमन

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भोपाल। वैसे तो भारत में अफ्रीकन चीतों की कहानी नई नहीं है। पहले कूनो और फिर बाद में गांधी सागर में चीतों को बसाया जा चुका है। अब चीतों के तीसरे घर कहे जा रहे नौरादेही में भी उन्हें बसाने की तैयारी जोरों से चल रही है। जुलाई में यहां चीते आएंगे, जिसका वन्यजीव प्रेमी, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। क्योंकि नौरादेही टाइगर रिजर्व में पहली बार चीते बाघों के बीच रहेंगे। ऐसे में चीते कैसे अपने आप को सुरक्षित और जीवित रख पाते हैं, ये शोध और अध्ययन का विषय होगा। अफ्रीकन चीतों का श्योपुर के कूनो और मंदसौर के गांधी सागर में बसाए जाने के बाद नौरादेही तीसरा घर होगा। पिछले साल मई माह में चीतों को नौरादेही में बसाए जाने के मामले में विशेषज्ञों की हरी झंडी दिखाई थी। जिसके बाद पिछले दिनों कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने नौरादेही में जुलाई माह में चीते छोड़े जाने का ऐलान कर दिया गया है। इसलिए यहां चीतों को बसाए जाने की तैयारियां तेज हो गई है।

कोएक्जिस्टेंस पर शोध और अध्ययन

कूनो और गांधी सागर के बाद नौरादेही टाइगर रिजर्व में बाघों के बीच चीतों को बसाया जाना शोध और अध्ययन का विषय है। चीता प्रोजेक्ट के विशेषज्ञ और राज्य वन अनुसंधान संस्थान भी इस पर नजर रखेगा कि एक ही जंगल में बाघ और चीतों के बीच सह अस्तित्व की स्थिति क्या है। कोएक्जिस्टेंस की बात करें, तो समाज विज्ञान और जीव विज्ञान में यह रिसर्च का बहुत बड़ा क्षेत्र है। प्राणी विज्ञान और वन्यजीवों के मामले में देखा जाए, तो किसी एक जंगल में अलग-अलग प्रकृति के जानवरों का बिना संघर्ष के शांतिपूर्ण रहना कोएक्जिस्टेंस कहलाता है। खासकर मांसाहारी जानवर जो एक ही तरह का शिकार पसंद करते हैं और अपनी टेरिटरी बनाते हैं, उनके बीच संघर्ष की परिस्थितियों अक्सर निर्मित हो जाती हैं।

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