ढलान पर जलती चिताएं: गाँव में शांति धाम नहीं, सम्मानजनक अंतिम संस्कार से वंचित ग्रामीण

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तेंदुखेड़ा (दमोह) — आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी विकास के दावों की हकीकत कई ग्रामीण इलाकों में अधूरी नजर आती है। तेंदुखेड़ा जनपद की ग्राम पंचायत कुलुआ के आश्रित ग्राम बंदोफहाड़ की स्थिति इस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ आज भी लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। सबसे गंभीर समस्या यह है कि गाँव में आज तक शांति धाम (श्मशान घाट) का निर्माण नहीं हुआ है, जिससे ग्रामीणों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार बेहद कठिन और असम्मानजनक परिस्थितियों में करना पड़ता है।

करीब 250 आबादी वाले इस पहाड़ी (टोरिया) क्षेत्र में बसे गाँव के लोग मजबूरी में पहाड़ी की तलहटी में, ढलान वाली जमीन पर अंतिम संस्कार करते हैं। यह जगह इतनी असमान है कि चिता ठीक से सजाना भी मुश्किल हो जाता है। परिक्रमा करना तो दूर, लोग ठीक से खड़े तक नहीं हो पाते। ऐसे हालात में अंतिम संस्कार करना ग्रामीणों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर वे अंतिम संस्कार करते हैं, वहाँ कंटीली झाड़ियाँ फैली हुई हैं और पंचायत द्वारा कभी साफ-सफाई तक नहीं कराई गई। बारिश के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है—तिरपाल और पन्नी के सहारे अंतिम संस्कार करना पड़ता है, जो न केवल असुविधाजनक बल्कि बेहद दुखद और असम्मानजनक है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पांचवें वित्त आयोग की राशि से शांति धाम निर्माण और उससे जुड़ी सुविधाओं—जैसे चबूतरा, टिन शेड, पेवर ब्लॉक, सीसी रोड—के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। आसपास के कई गाँवों में यह कार्य हो भी चुका है, लेकिन बंदोफहाड़ अब तक इस सुविधा से वंचित है।

ग्रामीणों ने पंचायत पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके गाँव में कोई भी विकास कार्य नहीं कराया जा रहा है। वे सीधे-साधे और गरीब किसान हैं, जो दबंगों के डर से खुलकर शिकायत भी नहीं कर पाते, इसी कारण अब तक अपने अधिकारों से वंचित हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एक सम्मानजनक अंतिम संस्कार भी ग्रामीणों के लिए सपना बनकर रह जाएगा?
अंतिम संस्कार केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का मौलिक सम्मान है। शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक को यह अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द उनके गाँव में शांति धाम का निर्माण कराया जाए, ताकि वे भी अपने प्रियजनों को सम्मानपूर्वक विदाई दे सकें।

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