घने जंगल के बीच आज भी खड़ा है 24 दरवाजे वाला हजार साल पुराना मंदिर,मूर्तिया जमींदोज, पुरातत्व विभाग को नहीं है खबर

पुरातत्व विभाग को खबर नहीं या फिर भी नहीं दे रहे ध्यान, धन के लालच में आए दिन खोदे जाते हैं गड्ढे
तेंदूखेड़ा
आज भी कुछ प्राचीन मंदिर व किले पुरातत्व विभाग की नजर से दूर हैं। जो धीर-धीरे खंडहरों में तब्दील होने की कगार पर हैं। तेंदूखेड़ा मुख्यालय से 40 किमी दूर ग्राम पंचायत चंदना के ग्राम हर्रई से 5 किमी दूर जंगल में एक हजार साल से भी अधिक पुराना मंदिर बना है। सिर्फ जंगल में बसे ग्राम के बुजुर्गों को ही पता है कि जंगल में राजाओं के द्वारा निर्माण कराया गया एक मंदिर है।

यहां पर पुरातन विरासत की शिल्पकला के बेजोड़ नमूने अनेक जगह बिखरे हुए हैं। जिसमें प्राचीन मंदिर मठ, मूर्तियां जमींदोज हो गई है। ग्राम के लोगों ने कहा कि यहां पर सैंकड़ों आकर्षक मूर्तियां है। पुरातन धरोहर के निशान व मूर्तियां व मठ देवरी ग्राम में बिखरी पड़ी है। चंदना ग्राम से लगभग 10 किमी दूर पहाड़ पर हजारों साल पुराना एक मंदिर बना हुआ है। ग्राम के लोग जिसे मंदिर वाला भरका के नाम से जानते हैं। मंदिर में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। ग्राम के बुजुर्गों का कहना है कि मंदिर के ऊपर भगवान भोलेनाथ की जलहरी बनी हुई है। साथ ही मंदिर में दरवाजों की चौखट लगी थी। लेकिन आज मूर्तियां गायब हैं। मंदिर के चारों तरफ 24 दरवाजे हैं। ऊपर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियां बनी हुई है। सीढ़ियों के नीचे शयन कोठी बनी है। जिसमें नीचे तकिया नुमा पत्थर लगा हुआ है। लेकिन इस मंदिर में धन के लालचियों ने पत्थर हटाकर यहां गहरा गड्डा खोद दिया गया है। वर्तमान में मंदिर के नाम पर मात्र लगभग 12-13 फीट ऊंची

दीवारें बनी हुई है। हर्रई गांव के 90 वर्षीय फतेह सिंह आदिवासी ने बताया 40 साल पहले मंदिर वाला भरका देखा था। उस वक्त मंदिर के ऊपर जलहरी व चारों ओर चौखट लगी हुई थी। हमारे पूर्वजों ने बताया था कि यहां पर हजारों साल पहले एक राजा ने जंगल में तपस्या कर सकने एक संत को पहाड़ पर रहने के लिए मंदिर बनाया था। जहां इस मंदिर में चारों ओर 24 दरवाजे लगे हुए थे। जिससे यह प्रतीत होता है कि राजा मां गायत्री का भक्त था। जयराम पाल 75 वर्ष व भूरे आदिवासी 70 वर्ष ने बताया कि यहां पर एक माता का मंदिर भी है। जो कि काली माता के नाम से हम लोग जानते हैं और पूजा करते हैं। साथ ही सिद्ध बाबा भी मौजूद है। इस जंगल में जहां पर एक सांप रहता है जो कि कई बार लोगों को दर्शन देने के लिए आता है। बताया गया है कि सिद्ध बाबा महाराज के पास जो एक सांप है। वह दिनभर जंगलों में घूमने के लिए निकल जाता है और रात में सिद्धबाबा के पास आ जाता है। हल्ले आदिवासी ने बताया कि हम लोगों को कई बार दर्शन दे चुका है साथ ही कुछ ही दूरी पर एक माता का मंदिर भी है जहां पर लोग नवरात्रि में पूजा अर्चना करते हैं और आते रहते हैं।

घाट उतरने के बाद लग जाता है जबलपुर जिला
24 दरवाजे वाले मंदिर के अंदर धन की लालच में लोगों ने मंदिर के अंदर भी बड़े बड़े गडढे बना दिए हैं। जो कि धन निकालने के लिए खुदाई की गई हो। वहीं जब इस घने जंगल में पहुंचकर देखा तो मंदिर के तीन और पहाड़ों के बड़े. बड़े भरका थे। जो कि देखने के लायक ही थे। लोगों ने बताया कि इस पहाड़ के एक किमी नीचे घाट उतरने के बाद जबलपुर जिले की सीमा लग जाती है। मनकेड़ी, बेलखेड़ा सहित विभिन्न गांव आते हैं। मंदिर के एक किलोमीटर के दायरे से पहाड़ व भरका दिखाई देते हैं। वहीं जंगल इतना घना है कि अकेले जाने में भी लोगों को डर लगता है
,तारादेही वन परिक्षेत्र अधिकारी देवेंद्र सिंह ठाकुर ने बताया है की वह प्राचीन मंदिर है जिसकी देख रेख ओर हिपाजत वन विभाग कर रहा है यहाँ लोगो को खुदाई करने से रोका जाता है कई ग्राम पंचायतों ने खकरी के लिये इसके पत्थर उठाने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें मना किया गया।चुकी यह देवरी बीट में आती है और कोर एरिया में होने के काऱण वन विभाग उसका संरक्षण करता है
